यूं एकटक क्या देख रहे हो,
कभी हवा की तरह छूकर तो गुजरो.
हम भी रेंत की तरह है,
बस संग तेरे कहीं दूर उड़ चलेंगे..!
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यूं एकटक क्या देख रहे हो,
कभी हवा की तरह छूकर तो गुजरो.
हम भी रेंत की तरह है,
बस संग तेरे कहीं दूर उड़ चलेंगे..!
ये जो नूर हैं इस चांद का,
ना जाने क्यों तुम्हारे चेहरे से मिलता है!
बादलों में छुप कर भी जैसे ये चांद चमकता है,
तुम्हारा चेहरा भी अनेकों परेशानी के बाद भी,
ऐसे ही तो दमकता है..!
माना की मेरे इश्क़ का ही ये खुमार है,
जो मेरी मुस्कुराहट को तुम्हारे होठों पर बिखेरता है,
और तुम्हारे अश्कों को मेरी आंखों से बहा देता है!!
ये जो नूर हैं इस चांद का...
कुछ तो मिलता-जुलता हैं तुम में और इस चांद में,
जैसे ये चांद रात के अंधेरों को कम कर देता हैं,
वैसे जैसे मेरे जीवन के अंधेरों में तुमने रोशनी भरी है,
माना की मंजिल अभी ज़रा दूर हैं,
पर साथी तुम हो तो ये भी मंजूर हैं..!
ये जो नूर हैं इस चांद का...
तुम्हें मुस्कुराता देख ये चांद भी खिलखिला उठता है,
और तुम्हारे रुठ जाने पर ये खुद को बादलों में छुपा लेता है,
ये मेरे चेहरे का नूर भी तुमसे है,
अब चाहे मोहब्बत कहों, इश्क़ कहों या कहों इसे प्यार,
सब तुम्हीं से है!!
ये जो नूर हैं इस चांद का,
मेरे लिए ये भी तुम्हीं से हैं..!
ये दिन भी गुज़र गया,
आज भी सिर्फ़ तेरा ख्वाब आया,
रास्ते की तरह तु भी कही ठहर गया,
जब मिलने का वक़्त आया,
ये दिन भी बेशर्मी से रुला गया,
इंतज़ार आंखों में नमी सा छा गया,
मगर तु ना आया,
आज भी सिर्फ़ तेरा ख्वाब आया..!
एक बार जो चढ़ा तुम्हारे इश्क़ का रंग मुझपर,
फिर वो मानों गहराता ही गया,
वो सांझ ढ़लें जब मिले थे हम, एक-दुजे में जब गुलें थे हम,
संगीत सुरिला बजा था तब,
जब तुम्हारे इश्क़ का रंग मुझपर चढ़ा था!!
लम्हों की उलझनों में मानों हम सुलझते गए,
एक दुजे में खोकर मैं और तुम से हम हो गए,
मेरी बिखरी जुल्फों को जब संवारा था,
तो मेरा जीवन संवरता सा लगा था,
जब तुम्हारे इश्क़ का रंग मुझपर चढ़ा था!!
मैंने आंखों से तुम्हारे हज़ारों अनकहे अलफ़ाज़ों को पढ़ा था,
तुम्हारे सीने पर सर रख, तुम्हारी बैचेन हुईं धड़कनों को सुना था,
मंज़िल की खबर नहीं है मुझे, पर हां मैंने खुद तुम्हें अपना रहगुज़र चुना था,
मेरा दिल उस रोज़ कुछ अलग तरहा से धड़का था,
जब तुम्हारे इश्क़ का रंग मुझपर चढ़ा था!!
दिन और दोपहरी तो किसी तरह निकल जाती,
दर्द तो तब होता था, जब तन्हाई और रात होती,
तुम अब वापस आये हो? इसमें क्या हैरानी है,
तुम गए ही न होते, तो कोई बात होती,
इतना लम्बा अरसा तम्हारे साथ गुजारा था हमने,
मैं भी तुम्हारी तरह भुला देता,गर शुरुआत होती,
हमारे भी वो वादे - वो बाते, झूठे होते अगर,
तो शायद आज यादो की, ऐसी न बारात होती,
अब वो पल याद करके दिल बैठ सा जाता है,
सोचता हू ,काश तुमसे कभी न मुलाकात होती,
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