मैं तो अधूरा सा इश्क़ हूँ, मुकम्मल प्यार थोड़े ही हूँ,
कुछ तो फर्क होगा ही ना जी, शायर आम हूँ राहत या गुलज़ार थोड़ी हूँ...!
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मैं तो अधूरा सा इश्क़ हूँ, मुकम्मल प्यार थोड़े ही हूँ,
कुछ तो फर्क होगा ही ना जी, शायर आम हूँ राहत या गुलज़ार थोड़ी हूँ...!
हर सूखे पत्ते पे लिख दू तुम्हारा नाम,
पर नहीं करना चाहता मै तुम्हे बदनाम,
बाज़ारे इश्क़ में सबसे महँगा हुआ करते थे,
फिर तुम्हीं ने आकर पूछ लिया हमारा दाम
इन् हाथो मे चाय की प्याली हुआ करती थी,
इन् हाथो में तुमने ही थमा दिए जाम,
मेरी मोहब्बत के गवाह है, कमरे और दिवार,
बिना तुम्हे याद किये, नहीं बीते है कोई शाम,
फ़क़त मै ही मोहब्बत किये जा रहा था,
मोहब्बत में कुछ तो रहा होगा तुम्हारा काम?
जो अपने शब्दो में आँसू छुपाते हैं लोग जिन्हें शायर कहते हैं,
जो खामोशी से सब कुछ सहते हैं लोग जिन्हें कायर कहते हैं,
जो अपना दर्द अपने शब्दो में बयां करते है लोग उन्हें पागल कहते हैं,
हम खुद को एक नया दिवाना कहते हैं लोग हमें भी शायर कहते हैं..!!
सितारों से आगे जहाँ और भी है,
अभी इश्क के इम्तिहा और भी है!
Qudrat ke faislo ka bhi laazim hai ehtraam...
warna mai chahti thi Mere sath tu rahe...
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