Jo log hamein khud-khushi ke muqam tak laate hai,
Kya woh is Qabil hote hai ke unki khaatir Apni jaan li jaye..?
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Jo log hamein khud-khushi ke muqam tak laate hai,
Kya woh is Qabil hote hai ke unki khaatir Apni jaan li jaye..?
हाँ अकेली हो गयी हूँ मैं,
तुम साथ निभाने आओगे क्या..?
हाँ टूट के बिखर रही हूँ मैं,
तुम जोड़ कर समेटने आओगे क्या..?
हाँ मर रही हूँ मैं,
तुम जीने की वजह बनोगे क्या..?
हाँ सुली चढ़ रही हूँ मैं,
तुम मेरी बर्बादी पर आओगे क्या..?
हाँ कफ़न ओढ़ रही हूँ मैं,
तुम मेरे इस दिदार पर आओगे क्या..?
हा मेरी कब्र सज रही है,
तुम वहा अपना घर बनाओगे क्या..?
हाँ हमेशा के लिए सो रही हूँ मैं,
तुम उस ज़मीन से सिर लगा कर सोओगे क्या..?
हाँ ज़िन्दगी ख़त्म हो रही हैं मेरी,
तुम मेरे लिए रोओगे क्या..?
Ehteram karti hu Gulami nahi,
Agar palko pe rakh sakti hu toh Nazro se Gira bhi sakti hu...
Us ki baarat pheeki pad gyi thi,
mere dukh me saara gaao shaamil tha...
रात की तन्हाई में तुमको देखा और चमक उठा,
चाँद भी अपना गुरूर तोड़कर और भी दमक उठा,
दरख़्त पे परिन्दे यु ही मायूस बैठे हुए थे,
तुम्हरे पायल की छन से पूरा बाग़ चहक उठा,
इत्र की सीसियो का तो ग़ुरूर तब टूट गया,
जब तुम्हारी खुशबू से पूरा शहर महक उठा,
देखकर तुमको जलती होगी ये सारी अप्सराये भी,
गजब तो तब हुआ जब पूरा क़ायनात दहक उठा,
यु तो मोहब्बत में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी,
तुम्हारी अदाओं पे शिवम् का भी दिल बहक उठा..!
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