नफरत की कैसी हवा चल रही है,
मकाँ जल रहे हैं दुकाँ जल रही है।
गंगा-जमुना के वारिस हैं हम भी
ये बात तुम्हें क्या बुरी लग रही है?
मरियम से सीता गले लग रही है
दिलों में स्नेह की कली खिली रही है।
अब्दुल से मिलने आए न मानस,
शायद साज़िश यही चल रही है।
